1901 से 2020 तक के 120 साल के आंकड़ों और 8 जलवायु मॉडलों के आधार पर हुए शोध में पता चला है कि हिमालय के पश्चिमी हिस्से में गर्मी सबसे ज्यादा बढ़ रही है। मध्य और पूर्वी हिमालय की तुलना में लद्दाख, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में तापमान हर मौसम में और हर स्थिति में तेजी से बढ़ रहा है। अध्ययन के मुताबिक पश्चिमी हिमालय में सर्दियों में गर्मी सबसे ज्यादा बढ़ रही है। दिन की तुलना में रात का तापमान तेजी से बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर प्रदूषण कम नहीं हुआ तो इस सदी के अंत तक पश्चिमी हिमालय में बसंत के मौसम में बर्फ पिघलने की रफ्तार, कम प्रदूषण वाले हालात के मुकाबले 3 गुना ज्यादा हो जाएगी।
जर्नल ऑफ अर्थ सिस्टम साइंस में प्रकाशित “वलनेरेब्लीटी ऑफ द हिमालयन रीज़न अंडर क्लाइमेट चेंज” शीर्षक वाले एक शोध अध्ययन में, राँची के बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (बीआईटी), मेसरा के रिमोट सेंसिंग एवं जियोइन्फॉर्मेटिक्स विभाग, पुणे के भारतीय उष्ण कटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) और अशोका विश्वविद्यालय भी शामिल थे। इस अध्ययन में भारतीय हिमालय के तीन हिस्सों में तापमान और बर्फ में हो रहे बदलावों का आकलन किया गया। साथ ही यह भी बताया गया कि 2100 तक ये बदलाव किस हद तक जा सकते हैं।
टीम ने अपने अध्ययन के लिए दो तरह के सबूतों का इस्तेमाल किया। पहला, 1901 से 2020 तक के 120 साल का असली तापमान का रिकॉर्ड। दूसरा, 8 ग्लोबल जलवायु मॉडल। पहले इन मॉडलों को बीते समय के आंकड़ों से जांचा गया, फिर इन्हें 2100 तक चलाया गया। इसके लिए उत्सर्जन कम करने से लेकर अभी जैसी रफ्तार से कोयला-पेट्रोल जलाने तक के 5 अलग-अलग हालात बनाए गए। अध्ययन में दो मौसमों पर खास ध्यान दिया गया – सर्दी, जब बर्फ जमता है, और मानसून से पहले का बसंत,जब बर्फ पिघलता है। पूरे हिमालय को अध्ययन के लिए तीन हिस्सों में बांटा गया है। “पश्चिमी हिमालय – लद्दाख, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश”, मध्य हिमालय – मुख्य रूप से उत्तराखंड और पूर्वी हिमालय – सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और पूरा पूर्वोत्तर, इन तीनों क्षेत्रों में 15,000 से ज्यादा ग्लेशियर हैं। यहीं से सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी बड़ी नदियां निकलती हैं। इन नदियों पर करीब 1.5 अरब लोगों की जिंदगी निर्भर है।
हिमालय अब तक करीब 1 डिग्री गर्म हो चुका है, लेकिन यह गर्मी हर जगह बराबर नहीं बढ़ी।1900 के पहले 30 सालों के मुकाबले 2014 तक के 20 सालों में सर्दियों में पूरे हिमालय का तापमान लगभग 1 डिग्री बढ़ा है। पश्चिमी हिमालय में 1.06°C, मध्य हिमालय में 0.96°C और पूर्वी हिमालय में 1.09°C की बढ़ोतरी दर्ज की गई। बसंत में पश्चिमी हिमालय 1.08°C गर्म हुआ, जबकि मध्य और पूर्वी हिमालय में बढ़ोतरी 0.83°C रही। रिपोर्ट के अनुसार गर्मी एक जैसी रफ्तार से नहीं बढ़ी। पिछले 20-30 सालों में सामान्य से ज्यादा गर्म साल ही आम हो गए हैं। ज्यादातर बदलाव इसी दौरान हुआ है। अध्ययन की प्रमुख लेखिका एवं बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (बीआईटी), मेसरा की प्रोत्यूषा मुखोपाध्याय ने कहा,,”हिमालय को अक्सर एक जैसा माना जाता है, लेकिन हमारे आंकड़े और मॉडल दोनों कुछ और कहते हैं। हर स्थिति में पश्चिमी हिमालय सबसे ज्यादा संवेदनशील निकला। यहीं सबसे ज्यादा गर्मी बढ़ी और सबसे ज्यादा बर्फ पिघली। इसका सीधा असर इन राज्यों पर पड़ेगा।;
उत्सर्जन ज्यादा रहा तो पश्चिमी हिमालय की सर्दियां 7 डिग्री से ज्यादा गर्म हो सकती हैं ।
मॉडलों से साफ है कि पूरे सदी में गर्मी पश्चिम से पूर्व की तरफ कम होती जाएगी। अगर उत्सर्जन इसी रफ्तार से बढ़ता रहा तो 2081- 2100 तक की सर्दियां 1900 के शुरुआती सालों के मुकाबले पश्चिमी हिमालय में 7.18°C, मध्य हिमालय में 6.71°C और पूर्वी हिमालय में 5.82°C ज्यादा गर्म होंगी। बसंत में भी यही पैटर्न रहेगा – पश्चिम में 6.91°C, मध्य में 6.41°C और पूर्व में 5.16°C की बढ़ोतरी। अशोका यूनिवर्सिटी के सह-लेखक पार्थसारथी मुखोपाध्याय ने कहा, ”पश्चिम और मध्य हिमालय में सर्दियां बसंत से भी तेज गर्म हो रही हैं। जमीन पर बर्फ कम होगी तो सतह गहरी दिखेगी और ज्यादा धूप सोखेगी। इससे और बर्फ पिघलेगी। यह अहम है क्योंकि सर्दियों में ही बर्फ जमा होती है। सर्दियां गर्म हुईं तो अगले महीनों में पिघलने के लिए बर्फ ही कम बचेगी।
“रातें दिन से ज्यादा गर्म हो रही हैं”
आंकड़ों में सबसे साफ संकेत यही है कि पश्चिमी और मध्य हिमालय में रात का न्यूनतम तापमान दिन के अधिकतम तापमान से तेज बढ़ रहा है। पश्चिमी हिमालय में सर्दियों में रात का तापमान 1.23°C बढ़ा, जबकि दिन का 0.87°C। बसंत में रात 1.25°C और दिन 0.91°C गर्म हुआ। मध्य हिमालय में यह फर्क और बड़ा है। यहां सर्दियों में रात 1.20°C बढ़ी, दिन सिर्फ 0.72°C। पूर्वी हिमालय अपवाद है। यहां सर्दियों में दिन का तापमान 1.19°C बढ़ा, जबकि रात का 0.99°C।रातें गर्म होना इसलिए जरूरी है क्योंकि इससे बर्फ और बर्फ के जमने के घंटे कम हो जाते हैं। इससे पिघलाव तेज होता है और नदियों तक पानी पहुंचने का समय भी बदल जाता है।
BIT मेसरा के सह-लेखक डॉ. स्वागता पायरा ने कहा
,“बढ़ता रात का तापमान इस कहानी का वो हिस्सा है जिस पर कम बात होती है, पर असर सबसे ज्यादा उसी का है। जब वो ठंडी रातें खत्म होने लगेंगी जो बर्फ को वापस जमने देती हैं, तो हम सिर्फ ये नहीं बदलेंगे कि कितनी बर्फ गिरी, बल्कि ये भी बदल देंगे कि पानी नीचे नदियों में कब पहुंचेगा”।
“बसंत में सबसे ज्यादा बर्फ खत्म हो रही है”
तीनों हिस्सों में सर्दियों के मुकाबले बसंत में ज्यादा बर्फ पिघल रही है। और सबसे ज्यादा नुकसान पश्चिमी हिमालय में हो रहा है। अध्ययन में इसे हर वर्ग मीटर जमीन पर जमी बर्फ के वजन से मापा गया है। पश्चिमी हिमालय में तो सबसे कम उत्सर्जन वाले हालात में भी बसंत की बर्फ लगातार कम हो रही है। 2040 तक 24.2 किलो प्रति वर्ग मीटर, 2060 तक 27.4 किलो और सदी के अंत तक 32 किलो बर्फ कम हो जाएगी। अगर उत्सर्जन ऊंचा रहा तो सदी के अंत तक ये नुकसान 95.9 किलो प्रति वर्ग मीटर तक पहुंच जाएगा। लेखकों के मुताबिक इससे इलाके के कुछ हिस्सों में मौसमी बर्फ लगभग पूरी तरह खत्म हो सकती है। मध्य हिमालय में नुकसान कम है, पर फिर भी काफी है – सदी के अंत तक 17.0 से 34.9 किलो प्रति वर्ग मीटर। पूर्वी हिमालय में सबसे कम नुकसान है – 5.5 से 11.1 किलो। सर्दियों में भी यही पैटर्न है। पश्चिमी हिमालय में सदी के अंत तक बर्फ का नुकसान सबसे कम उत्सर्जन पर 9.5 किलो और सबसे ज्यादा उत्सर्जन पर 53.2 किलो प्रति वर्ग मीटर रहने का अनुमान है।
उत्सर्जन परिदृश्यों के बीच का अंतर
यदि उत्सर्जन में तीव्र कमी होती है तो पश्चिमी हिमालय की सर्दियाँ सदी के अंत तक 2.55°C अधिक गर्म होंगी, जबकि यदि कमी नहीं होती तो 7.18°C अधिक गर्म होंगी (4.6°C का अंतर)। वसंत ऋतु की बर्फ़ पर, उच्च-उत्सर्जन पथ इस क्षेत्र को निम्न-उत्सर्जन पथ की तुलना में तीन गुना अधिक खर्च करता है; शीतकालीन बर्फ़ पर तो पाँच गुना से भी अधिक। आठ मॉडल अगले दो से तीन दशकों पर काफी हद तक सहमत हैं। वे सन् 2100 की ओर बहुत अधिक भिन्न हो जाते हैं क्योंकि इस बात पर निर्भर करता है कि क्षेत्र तब तक कितना गर्म होगा, यह उन विकल्पों पर निर्भर है जो अभी तक नहीं लिए गए हैं।
मुखोपाध्याय ने कहा, “मॉडल इस बात पर सहमत हैं कि अगले दो से तीन दशकों में हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं। जो खुला है वह सदी का दूसरा भाग है, और वह उत्सर्जन द्वारा निर्धारित होता है, न कि पहाड़ों की किसी आंतरिक विशेषता से। निम्न-उत्सर्जन पथ वार्मिंग को रोकता नहीं है, लेकिन यह इसके परिमाण को कई डिग्री तक बदल देता है।” तीनों में से पूर्वी हिमालय सबसे कम गर्म होता है और सबसे कम बर्फ खोता है, तथा उत्सर्जन पथों के बीच इसका परिदृश्य सबसे कम भिन्न होता है। हालाँकि, अध्ययन में कहा गया है कि पूर्वी क्षेत्र ग्लेशियल झील विस्फोट बाढ़ (ग्लोफ) के लिए एक हॉटस्पॉट बन गया है – ये अचानक, विनाशकारी बाढ़ें होती हैं जो तब आती हैं जब ग्लेशियरी मलबे से बंधी झील टूट जाती है। प्रोत्यूषा ने कहा, “यह जोखिम भविष्य में पश्चिम की ओर फैलने की उम्मीद है, जो पीछे हटते ग्लेशियरों और उनके द्वारा छोड़ी गई नई झीलों के कारण होगा, न कि केवल तापमान के कारण।”
शोधकर्ताओं की सिफारिशें
शोधकर्ताओं ने क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुरूप जलवायु सेवाओं और अनुकूलन नीतियों को विकसित करने की जरूरत बताई है। उन्होंने ग्लेशियरों और बर्फ की स्थिति में होने वाले बदलावों पर नजर रखने के लिए जमीनी स्तर के निगरानी नेटवर्क, सैटेलाइट डेटा और लगातार उच्च- रिजॉल्यूशन मॉडलिंग को एकीकृत करने की सिफारिश की है, ताकि लगभग रियल-टाइम में इन बदलावों की निगरानी की जा सके। शोधकर्ताओं ने मजबूत प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों (Early Warning Systems), सतत जल प्रबंधन, समुदाय स्तर पर जलवायु-लचीलापन कार्यक्रमों और सीमा पार सहयोग को भी मजबूत करने की जरूरत बताई है। अध्ययन के लेखकों के अनुसार, इन ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में पानी वास्तव में किस तरह प्रवाहित होता है, इसे मौजूदा मॉडल अभी भी पूरी तरह से नहीं दर्शा पाते हैं। इसलिए जमीन पर अधिक व्यापक और निरंतर माप एवं निगरानी की आवश्यकता है। इसके बिना यह निश्चित रूप से बताना मुश्किल है कि हर वर्ष कितनी बर्फ और ग्लेशियर की बर्फ पिघलती है और उसमें से कितना पानी नीचे बहने वाली नदियों तक पहुंचता है।
अध्ययन के बारे में
शोध का नेतृत्व: प्रोत्यूषा मुखोपाध्याय, रिमोट सेंसिंग एवं जियोइनफॉर्मेटिक्स विभाग, बिरला प्रौद्योगिकी संस्थान, मेसरा, रांचीसह-लेखक:टी. पी. साबिन – भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय, पुणेस्वागता पायरा और अखौरी प्रमोद कृष्णा – बिट मेसरा, रांचीपार्थसारथी मुखोपाध्याय – पर्यावरण अध्ययन विभाग, अशोका विश्वविद्यालय, सोनीपत प्रकाशन: जर्नल ऑफ अर्थ सिस्टम साइंस (2026) 135:138
ऑनलाइन प्रकाशित: 9 जून 2026
DOI लिंक: https://doi.org/10.1007/s12040-026-02846-9
शीर्षक: “वलनेरेब्लीटी ऑफ द हिमालयन रीज़न अंडर क्लाइमेट चेंज” डेटा स्रोत: CRU TS v4.07 ग्रिडेड अवलोकन 1901–20208 मॉडल वाला CMIP6 समूह – ऐतिहासिक आंकड़े 1901–2014 और प्रोजेक्शन 2015–2100, पांच SSP परिदृश्यों के तहतनोट: सभी बदलावों की तुलना 1901–1930 के औसत जलवायु आधार से की गई है।

