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Monday, November 2, 2026
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लुधियाना : स्पीकर कुलतार सिंह संधवां की परीक्षा: क्या सभी विधायकों पर कानून समान रूप से लागू होगा या आम आदमी पार्टी की राजनीतिक सुविधा के अनुसार फैसले होंगे?

आम आदमी पार्टी (AAP) के कुछ मौजूदा विधायकों द्वारा इस्तीफा देकर भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के घटनाक्रम ने पंजाब विधानसभा के स्पीकर कुलतार सिंह संधवां को एक महत्वपूर्ण संवैधानिक और कानूनी परीक्षा के सामने खड़ा कर दिया है।

आम आदमी पार्टी के नेता दल-बदल विरोधी कानून और पार्टी अनुशासन का हवाला देकर विधानसभा अध्यक्ष पर उन विधायकों के विरुद्ध कार्रवाई करने का दबाव बना सकते हैं, जिन्होंने पार्टी छोड़ दी है। लेकिन स्पीकर को यह भी स्पष्ट करना होगा कि क्या उन्होंने खडूर साहिब के विधायक मनजिंदर सिंह लालपुरा के मामले में भी समान संवैधानिक जिम्मेदारी और कानूनी गंभीरता दिखाई थी?

लालपुरा को सितंबर 2025 में तरनतारन की एक अदालत ने एक आपराधिक मामले में दोषी ठहराते हुए चार वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। यह मामला अनुसूचित जाति की एक महिला के साथ मारपीट और छेड़छाड़ से संबंधित था। उनकी दोषसिद्धि के विरुद्ध पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में अपील लंबित रही है इस विषे को लेकर एस आर लाधर ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है के श्री लालपुरा को स्पीकर ने अयोग्य घोषित कियों नहीं किया ?

अभी तक वो किस आधार पर मानयोग विधायक बने हुए हैं? क्या स्पीकर देश के सविधान और सुप्रीम कोर्ट से भी ऊपर हैं?

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8(3) के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति को किसी अपराध में दोषी ठहराकर कम से कम दो वर्ष के कारावास की सजा सुनाई जाती है, तो वह दोषसिद्धि की तारीख से चुनाव लड़ने और निर्वाचित पद पर बने रहने के लिए अयोग्य हो जाता है, बशर्ते दोषसिद्धि पर कोई प्रभावी न्यायिक रोक न हो।

सर्वोच्च न्यायालय ने लिली थॉमस बनाम भारत संघ (2013) के ऐतिहासिक फैसले में भी स्पष्ट किया था कि केवल अपील दायर कर देने से किसी मौजूदा सांसद या विधायक को तत्काल अयोग्यता से संरक्षण नहीं मिलता।

फरवरी 2026 में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने खडूर साहिब विधानसभा सीट को श्री लालपुरा की दोषसिद्धि के बाद रिक्त घोषित करने की मांग वाली जनहित याचिका पर पंजाब सरकार और विधानसभा से जवाब मांगा था।

स्पीकर के सामने कुछ सीधे सवाल हैं:

  1. जब लालपुरा को चार वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई, तब उनकी विधानसभा सदस्यता के कानूनी परिणामों पर उतनी तत्परता क्यों नहीं दिखाई गई, जितनी आज AAP छोड़ने वाले विधायकों के मामलों में दिखाई जा रही है?
  2. क्या विधानसभा अध्यक्ष ने चार वर्ष की सजा के बाद एक मौजूदा विधायक की सदस्यता पर पड़ने वाले कानूनी प्रभावों की जांच के लिए आवश्यक कदम उठाए थे?
  3. क्या स्पीकर का कार्यालय संविधान और कानून से संचालित होता है या सत्तारूढ़ दल के राजनीतिक हितों से प्रभावित होकर निर्णय लेता है?

विधानसभा अध्यक्ष केवल सत्तारूढ़ दल के प्रतिनिधि नहीं होते। वह एक संवैधानिक पद पर आसीन होते हैं और उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे राजनीतिक दलों से ऊपर उठकर निष्पक्षता, स्वतंत्रता और संवैधानिक मर्यादा के साथ काम करें।

दल-बदल विरोधी कानून को राजनीतिक सुविधा का हथियार नहीं बनाया जा सकता और न ही वैधानिक अयोग्यता के प्रावधानों की अनदेखी की जा सकती है।

मैं विधानसभा अध्यक्ष से मांग करता हूं कि वे लालपुरा के मामले में अब तक की गई कार्रवाई और कानूनी स्थिति को सार्वजनिक करें तथा पंजाब की जनता के सामने अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी का स्पष्टीकरण दें।

पंजाब को संवैधानिक जवाबदेही, कानून के समान अनुपालन और विधानसभा की गरिमा का सम्मान चाहिए। कानून उन विधायकों पर भी समान रूप से लागू होना चाहिए जो AAP में बने हुए हैं और उन पर भी जो पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में शामिल हो रहे हैं।

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