किसी गांव के लिए बस सेवा केवल एक जगह से दूसरी जगह जाने का साधन नहीं होती। वह बच्चों के लिए स्कूल पहुंचने का भरोसा, मरीजों के लिए स्वास्थ्य केंद्र तक जाने का रास्ता, किसानों और वन उपज संग्राहकों के लिए हाट-बाजार तक पहुंच और मजदूरों के लिए काम के बाद घर लौटने की सुविधा भी होती है। छत्तीसगढ़ के बस्तर और सरगुजा संभाग के अनेक गांवों में यह सहज सुविधा लंबे समय तक उपलब्ध नहीं थी। घने जंगलों, पहाड़ी रास्तों, बिखरी बसाहटों और कम यात्री संख्या के कारण निजी बस संचालक इन मार्गों पर सेवा देने से कतराते थे। ग्रामीणों को पिकअप या मालवाहक वाहनों के खुले हिस्से में सफर करना पड़ता था, कई बार अधिक किराया देकर भी, बिना तय समय और बिना बैठने की सुरक्षित जगह के।
इसी जरूरत को ध्यान में रखकर छत्तीसगढ़ शासन ने मुख्यमंत्री ग्रामीण बस योजना शुरू की। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार ने दुर्गम और कम यात्री संख्या वाले गांवों को नियमित यात्री परिवहन से जोड़ने का प्रयास किया। योजना का शुभारंभ 4 अक्टूबर 2025 को जगदलपुर से हुआ। एक वर्ष के भीतर इस पहल का विस्तार बस्तर और सरगुजा संभाग के 13 जिलों तक पहुंचा। सितंबर 2026 की स्थिति में 106 मार्गों पर 107 बसें संचालित थीं और 850 ऐसे गांव पहली बार नियमित बस सुविधा से जुड़े, जहां पहले नियमित यात्री बस नहीं पहुंचती थी। एक वर्ष में इन बसों ने लगभग 24 लाख किलोमीटर की दूरी तय की।
बस्तर में दूरी केवल किलोमीटर से नहीं मापी जाती
बस्तर संभाग के अंदरूनी इलाकों में किसी गांव तक पहुंचना कई बार केवल नक्शे पर दूरी देखने जितना सरल नहीं होता। जंगलों से गुजरते रास्ते, दूर-दूर बसे गांव और सीमित परिवहन विकल्प रोजमर्रा के कामों को भी कठिन बना सकते हैं। सुकमा और बीजापुर जैसे जिलों के अंदरूनी क्षेत्रों तथा नियद नेल्लानार ग्रामों में बस सेवा पहुंचाना इसलिए केवल मार्ग तय करने का काम नहीं था, यह उन इलाकों तक सार्वजनिक सुविधा पहुंचाने की कोशिश थी, जहां नियमित यातायात उपलब्ध कराना व्यावसायिक दृष्टि से कठिन माना जाता था।
योजना के तहत सुकमा जिले के पुवर्ती, जगरगुंडा, किस्टाराम और गोलापल्ली जैसे गांव नियमित बस सेवा से जुड़े हैं। बस्तर संभाग में सुकमा, दंतेवाड़ा, बीजापुर, नारायणपुर, बस्तर, कोंडागांव और कांकेर जिलों के 55 मार्गों पर 57 बसें चल रही हैं। सरगुजा संभाग के छह जिलों में 51 मार्गों पर 50 बसें संचालित हैं। कुल अधिसूचित मार्गों की लंबाई लगभग 5,300 किलोमीटर है। मार्ग 14 से 105 किलोमीटर तक लंबे हैं और उनकी औसत लंबाई करीब 49 किलोमीटर है। सामान्यतः बसें प्रतिदिन दो यात्राएं करती हैं।
योजना की उपलब्धि केवल इस बात में नहीं है कि बसें दुर्गम इलाकों तक पहुंचीं। अहम यह भी है कि स्थानीय जरूरतों के अनुसार मार्ग चुने गए। मार्गों के प्रस्ताव अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) और जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी तैयार करते हैं। जिला स्तरीय समिति उनकी जांच करती है और राज्य स्तरीय समिति चयन करती है। इससे गांवों की जरूरत और प्रशासनिक समीक्षा, दोनों को प्रक्रिया में जगह मिलती है।
सुरक्षित सफर और किराये में राहत
योजना से पहले कोंटा से जगरगुंडा के 83 किलोमीटर के सफर में यात्रियों को पिकअप या मालवाहक वाहन में खुले हिस्से पर खड़े होकर यात्रा करनी पड़ती थी। इसके लिए 200 रुपये या उससे अधिक देना पड़ सकता था। अब इसी मार्ग पर योजना की बस में तय समय पर सीट के साथ यात्रा का किराया 130 रुपये है। गांवों के बीच छोटी दूरी के लिए भी, जहां पहले वाहन उपलब्ध होने पर 200 रुपये तक देने पड़ते थे, अब निर्धारित समय-सारिणी के अनुसार 50 रुपये में सफर संभव है।
यह बदलाव महिलाओं, बच्चों, मरीजों और बुजुर्ग यात्रियों के लिए खास मायने रखता है। बस में सीट और तय समय होने से यात्रा अधिक व्यवस्थित और सुरक्षित बनती है। जून 2026 में कोंटा-जगरगुंडा मार्ग पर किए गए फील्ड सर्वे में यात्रियों ने बस सेवा को सुरक्षित बताया।
बस से खुलते हैं शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका के रास्ते
नियमित बस सेवा का असर कई बार यात्रा के समय से आगे जाकर दिखाई देता है। कोंटा क्षेत्र का 12 वर्षीय एक छात्र रोज बस से भेज्जी के स्कूल जाता है। उसी मार्ग पर चिंतागुफा का आरोग्य मंदिर भी स्थित है। अब मरीजों और उनके परिजनों के लिए स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचने का एक नियमित विकल्प उपलब्ध है।
स्थानीय विक्रेता आम, महुआ, मुर्गी और अन्य वनोपज लेकर हाट-बाजार जा सकते हैं और उसी दिन गांव लौट सकते हैं। आंध्र प्रदेश में दिहाड़ी पर काम करने वाले मजदूर भी काम के बाद उसी दिन वापस लौट पा रहे हैं, जिससे उन्हें रात बाहर बिताने की जरूरत कम होती है। युवा रोजगार के लिए कोंटा और जगदलपुर तक जा सकते हैं। बसों में यात्रियों के साथ सामान भी पहुंचता है। वन उपज बाजार तक और जरूरत का सामान गांवों तक। इस तरह गांव, हाट और ब्लॉक मुख्यालय के बीच रोजमर्रा का संपर्क मजबूत होता है।
बस सेवा का लाभ सुरक्षा बलों के आवागमन में भी दिखाई देता है। मार्गों के सीआरपीएफ कैंपों के जवान भी इन बसों से यात्रा करते हैं। यह उदाहरण बताता है कि नियमित सार्वजनिक परिवहन का असर स्थानीय जीवन के कई पक्षों तक फैल सकता है- शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार, रोजगार और आवागमन, सभी इससे जुड़े हैं।
कठिन मार्गों पर सेवा के लिए सरकारी सहयोग
दुर्गम और कम यात्री संख्या वाले मार्गों पर बस चलाने का खर्च संचालकों के लिए अधिक हो सकता है, जबकि किराये से पूरी लागत वसूलना कठिन रहता है। इस अंतर को कम करने के लिए राज्य सरकार प्रति किलोमीटर वित्तीय सहायता देती है। योजना के तहत पहले वर्ष 26 रुपये, दूसरे वर्ष 24 रुपये और तीसरे वर्ष 22 रुपये प्रति किलोमीटर सहायता का प्रावधान है। बस संचालकों को मासिक मोटरयान कर में अधिकतम तीन वर्ष तक छूट भी दी जाती है। सितंबर 2026 तक 107 बस संचालकों को कुल 5.77 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता दी जा चुकी थी। बस और किराये का संचालन निजी संचालक करते हैं, सरकार अधिसूचित मार्ग पर सेवा जारी रखने के लिए सहयोग देती है।
तकनीक के उपयोग से संचालन और भुगतान की निगरानी भी की जाती है। बसों में वीएलटीडी (जीपीएस) उपकरणों से उनकी स्थिति परिवहन विभाग के नियंत्रण एवं कमांड सेंटर तक पहुंचती है। एमएमजीबीवाई पोर्टल पर बसों की लाइव ट्रैकिंग, मार्ग, ट्रिप और स्टॉपेज की जानकारी उपलब्ध है। भुगतान अधिसूचित मार्ग पर तय किए गए किलोमीटर और ऑनलाइन जीपीएस रिपोर्ट के आधार पर होता है। क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी दैनिक रिपोर्ट की जांच करते हैं। यात्रियों के लिए समय-सारिणी बस संगवारी ऐप पर उपलब्ध है।
अगले चरण में विस्तार की तैयारी
योजना का अगला चरण इसे नए क्षेत्रों तक ले जाने की दिशा में है। आठ जिलों के अनुसूचित क्षेत्रों के 85 आदिवासी विकासखंडों में बस सेवा विस्तार का निर्णय लिया गया है। इसके लिए 60 से 80 बसें प्रस्तावित हैं। अनुमान है कि इससे 4,368 ऐसे गांवों और लगभग 14.57 लाख लोगों को लाभ मिल सकता है, जहां अभी बस सुविधा उपलब्ध नहीं है। यात्रियों के लिए यूपीआई और क्यूआर कोड से किराया भुगतान की सुविधा भी प्रस्तावित है।
दृष्टिबाधित और बौद्धिक दिव्यांग यात्रियों, दोनों पैरों से चलने में असमर्थ व्यक्तियों, 80 वर्ष या उससे अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों तथा एचआईवी या एड्स से पीड़ित यात्रियों को सहायक सहित 100 प्रतिशत किराया छूट का प्रावधान है। कलेक्टर द्वारा प्रमाणित नक्सल प्रभावित व्यक्तियों को 50 प्रतिशत छूट दी जाती है।
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में मुख्यमंत्री ग्रामीण बस योजना ने परिवहन की कमी से जूझ रहे गांवों तक सार्वजनिक सेवा पहुंचाने का एक व्यावहारिक मॉडल प्रस्तुत किया है। बस्तर की दुर्गम राहों पर चलती बसें इस बात का संकेत हैं कि विकास का रास्ता तभी व्यापक होता है, जब वह दूरस्थ गांवों तक पहुंचे। जहां पहले सफर अनिश्चित, महंगा और असुरक्षित था, वहां अब नियमित बस बच्चों को स्कूल, मरीजों को स्वास्थ्य केंद्र, ग्रामीणों को हाट और श्रमिकों को काम तक पहुंचाने में सहायक बन रही है। यही इस योजना की सबसे बड़ी उपलब्धि है, दूरी घटने के साथ अवसरों का बढ़ना।

