जंगल केवल प्रकृति की धरोहर नहीं, बल्कि भविष्य की सुरक्षा और समृद्धि की नींव भी हैं। इसी सोच को साकार करने के उद्देश्य से हिमाचल प्रदेश सरकार ने राजीव गांधी वन संवर्धन योजना आरंभ की है। यह योजना केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि जनभागीदारी, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण आजीविका को एक सूत्र में पिरोने का सशक्त प्रयास है।
हिमाचल प्रदेश अपनी प्राकृतिक सुंदरता, वनों, झरनों, नदियों और पहाड़ों के लिए प्रसिद्ध है। बदलते जलवायु परिदृश्य, बढ़ते तापमान और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव के बीच वन संरक्षण और उनका विस्तार समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए मुख्यमं़ंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खु के नेतृत्व में राज्य सरकार ने ऐसी योजना तैयार की है, जिसमें प्रकृति के संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीणों के आर्थिक सशक्तिकरण को भी समान महत्व दिया गया है।
राजीव गांधी वन संवर्धन योजना की सबसे बड़ी विशेषता इसकी जनभागीदारी आधारित कार्यप्रणाली है। इस नवीन व्यवस्था मंे महिला मंडलों, युवक मंडलों, स्वयं सहायता समूहों और अन्य पंजीकृत समुदाय आधारित संगठनों को सीधे इस अभियान से जोड़ा गया है। ये संगठन खाली एवं बंजर वन भूमि पर पौधरोपण करने के साथ-साथ पौधों के संरक्षण और रखरखाव की जिम्मेदारी भी निभा रहे हैं। यह व्यवस्था न केवल पौधों की बेहतर देखभाल सुनिश्चित कर रही है, बल्कि स्थानीय समुदायों में वनों के प्रति अपनत्व और संरक्षण की भावना भी विकसित करेगी।

योजना पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई ऊर्जा प्रदान कर रही है। योजना के अंतर्गत पारिस्थितिकीय आवश्यकता और उपलब्धता के आधार पर प्रत्येक समुदाय आधारित संगठन को अधिकतम पांच हेक्टेयर तक खाली अथवा बंजर वन भूमि आवंटित की जा रही है। वन विभाग अपनी नर्सरियों से गुणवत्तायुक्त पौधों की उपलब्धता सुनिश्चित कर रहा है तथा नियमित निगरानी एवं मूल्यांकन के माध्यम से पौधरोपण की सफलता पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
पौधरोपण और पौधों के रखरखाव के लिए 1.20 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर की वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है। एक हेक्टेयर से कम क्षेत्र होने पर यह राशि आनुपातिक आधार पर दी जाती है। इसके अतिरिक्त, रोपे गए पौधों की सत्यापित जीवित प्रतिशतता के आधार पर 1.20 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर की अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि भी दी जा रही है। इससे हजारों ग्रामीणों को स्थानीय स्तर पर प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर प्राप्त हो रहे हैं।
राजीव गांधी वन संवर्धन योजना केवल वृक्षारोपण तक सीमित नहीं है। यह योजना केवल वर्तमान को नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के बेहतर जीवन के दृष्टिगत अमल में लाई जा रही है। इसका उद्देश्य कार्बन पृथक्करण को बढ़ावा देना, जल संरक्षण को मजबूत करना, मृदा अपरदन को रोकना तथा स्थानीय जैव विविधता का संरक्षण करना भी है। स्थानीय प्रजातियों के पौधरोपण से प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूती मिलेगी और लोगों में वन संरक्षण के प्रति जागरूकता भी बढ़ेगी। वनों के संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भागीदारी भविष्य में प्राकृतिक संसाधनों के सतत प्रबंधन का मजबूत आधार बनेगी।

राज्य सरकार ने वर्ष 2030 तक प्रदेश के वन आवरण को 30 प्रतिशत तक बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। राजीव गांधी वन संवर्धन योजना से न केवल हरित क्षेत्र में वृद्धि हो रही है, बल्कि ग्रामीणों को घर-द्वार पर रोजगार उपलब्ध हो रहा है।
धर्मशाला के समीप घुरकड़ी की स्वयं सहायता समूह ओम नमो नारायण की प्रधान आशा देवी तथा समूह की सदस्या अनीता कुमारी, अरुणा कुमारी, पुष्पा देवी, अनीता देवी, शांति देवी और प्रेमलता अपने अनुभव साझा करते हुए बताती हैं कि वन विभाग ने उन्हें राजीव गांधी वन संवर्धन योजना के तहत इस कार्य की जिम्मेदारी सौंपी। उन्होंने लगभग दो हेक्टेयर क्षेत्र में फैली लैंटाना की झाड़ियों को हटाकर भूमि को तैयार किया, बाड़बंदी की तथा स्थानीय प्रजातियों के 1,600 से अधिक पौधे रोपित किए। इसके बाद उन्होंने नियमित रूप से पौधों की देखभाल और संरक्षण सुनिश्चित किया। समूह की सदस्य बताती हैं कि जंगली जानवरों से पौधों की सुरक्षा के लिए उन्होंने पारंपरिक घरेलू उपायों का भी सफलतापूर्वक प्रयोग किया। उनके निरंतर प्रयासों का परिणाम है कि आज उनके द्वारा लगाए गए 1,600 से अधिक पौधे सुरक्षित हैं और स्वस्थ रूप से विकसित हो रहे हैं।
मंडलीय वन अधिकारी अमित कुमार बताते हैं कि राजीव गांधी वन संवर्धन योजना हिमाचल प्रदेश सरकार की एक अत्यंत महत्वाकांक्षी पहल है। इस योजना का उद्देश्य वन संरक्षण और संवर्धन में स्थानीय समुदाय की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना है। इसके अंतर्गत महिला मंडलों, युवक मंडलों, स्वयं सहायता समूहों तथा अन्य सामुदायिक संगठनों के माध्यम से वन क्षेत्रों में पौधरोपण कराया जाता है।

प्रदेश सरकार ने वर्ष 2030 तक हिमाचल प्रदेश के वन आवरण को लगभग 28 प्रतिशत से बढ़ाकर 30 प्रतिशत करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य की प्राप्ति में राजीव गांधी वन संवर्धन योजना की महत्वपूर्ण भूमिका है। पिछले वर्ष धर्मशाला वन मंडल के अंतर्गत लगभग 28 हेक्टेयर क्षेत्र में पौधरोपण किया गया, जिसमें लगभग 22,000 पौधे लगाए गए। यह कार्य महिला मंडलों, युवक मंडलों और स्वयं सहायता समूहों की सक्रिय भागीदारी से सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। डीएफओ बताते हैं कि इस योजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि केवल पौधे लगाने तक ही इसकी प्रक्रिया सीमित नहीं रहती, बल्कि अगले वर्ष लगाए गए पौधों की जीवित रहने की प्रतिशतता का भी आकलन किया जाता है। यदि पौधों का संरक्षण और रखरखाव संतोषजनक पाया जाता है, तो संबंधित महिला मंडल, युवक मंडल या स्वयं सहायता समूह को प्रोत्साहन स्वरूप एक लाख रुपये तक की सम्मान राशि प्रदान करने का प्रावधान है। वर्तमान वर्ष में इस योजना के तहत और भी बड़े स्तर पर कार्य करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए धर्मशाला वन मंडल के अंतर्गत 17 महिला मंडलों, 6 युवक मंडलों तथा 5 स्वयं सहायता समूहों को शामिल किया गया है। यह अभियान धर्मशाला वन मंडल के अंतर्गत आने वाले चारों विधानसभा क्षेत्रों धर्मशाला, शाहपुर, नगरोटा बगवां और कांगड़ा में संचालित किया जाएगा। पौधरोपण के दौरान मुख्य रूप से हरड़, बेहड़ा, आंवला जैसे औषधीय एवं फलदार पौधों के साथ-साथ अन्य स्थानीय प्रजातियों को प्राथमिकता दी जा रही है, ताकि पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ जैव विविधता और स्थानीय आजीविका को भी बढ़ावा मिल सके। पिछले वर्ष लोगों ने इस योजना में बढ़-चढ़कर भाग लिया था। इस वर्ष भी हमें लगभग 3,000 महिलाओं सहित बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों की भागीदारी की उम्मीद है।
उन्होंने सभी से आग्रह किया कि वे इस जनभागीदारी आधारित अभियान से जुड़ें, अधिक से अधिक पौधे लगाएं और उनके संरक्षण का संकल्प लेकर हिमाचल प्रदेश को और अधिक हरित एवं समृद्ध बनाने में अपना योगदान दें।

