
900 साल पुरानी भारतीय संत की ममी! श्री रंगनाथस्वामी मंदिर में आज भी सुरक्षित है गुरु रामानुजाचार्य का शरीर
जब हम ममी शब्द सुनते हैं तो आमतौर पर मिस्र के प्राचीन ताबूतों और हॉलीवुड फिल्मों की याद आती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में भी एक 900 साल पुरानी ममी मौजूद है? दक्षिण भारत के श्री रंगनाथस्वामी मंदिर (श्रीरंगम, तिरुचिरापल्ली) में आज भी महान संत और दार्शनिक गुरु रामानुजाचार्य का शरीर सुरक्षित रखा गया है, जिनके दर्शन के लिए लोग देश-विदेश से आते हैं।
हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद दाह संस्कार की परंपरा है, जबकि मिस्र में शरीर को संरक्षित करने की परंपरा रही है। इसी परंपरा की झलक गुरु रामानुजाचार्य के शरीर में देखी जा सकती है। कहा जाता है कि उनके शरीर को सुरक्षित रखने के लिए चंदन, हल्दी, केसर और कपूर का मिश्रण लगाया जाता है। साल में दो बार पुजारी इस मिश्रण का लेप दोबारा करते हैं, जिससे शरीर का रंग गेरुआ दिखाई देता है और वह आज भी सुरक्षित बना हुआ है।
गुरु रामानुजाचार्य 11वीं शताब्दी के महान दार्शनिक, समाज सुधारक और वैष्णव संप्रदाय के प्रमुख आचार्य थे। उनके विचारों ने भक्ति आंदोलन को नई दिशा दी। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, उन्होंने 1137 ईस्वी में समाधि ली थी।
मंदिर में उनका शरीर एक विशेष कक्ष में, मूर्ति के पीछे स्थापित है। भक्तजन उनके वास्तविक शरीर के दर्शन कर सकते हैं — उनके नाखूनों और उंगलियों को देखकर यह स्पष्ट होता है कि यह मूर्ति नहीं, बल्कि असली शरीर है। मंदिर के पुजारियों के अनुसार, यह व्यवस्था स्वयं भगवान रंगनाथ के आदेश पर की गई थी।
गुरु रामानुजाचार्य ने अपनी मृत्यु से पहले अपने शिष्यों को यह बता दिया था कि वे तीन दिन तक उनके साथ रहेंगे, जिसके बाद उन्होंने शांत भाव से अपनी अंतिम सांस ली। आज भी उनका शरीर इस बात का साक्ष्य है कि भारतीय परंपरा में विज्ञान, आस्था और अध्यात्म का कितना गहरा संगम रहा है।

