आंदाज 2 समीक्षा: अक्षय कुमार की कई साल पहले बनी हिट फिल्म ‘आंदाज’ ने दर्शकों का मन मोह लिया था, लेकिन इसके सीक्वल को लेकर लोग अब सवाल उठा रहे हैं कि यह फिल्म क्यों बनाई गई? समीक्षा में इस सवाल का जवाब जानें|

क्यों कुछ फिल्में बनाई जाती हैं, उनके उद्देश्य क्या होते हैं, यह कैसे बनाई जाती हैं, और क्यों कुछ फिल्में इतनी खराब बनाई जाती हैं, क्या उन्हें उनके निर्माता भी नहीं देखते हैं, ये सभी सवाल उनके दिमाग में आते हैं, जब वे उन फिल्मों को देखते हैं जिनका नाम ‘अंदाज 2’ है और जिसे अक्षय कुमार की फिल्म ‘अंदाज’ का सीक्वल कहा जा रहा है। इस फिल्म को बनाने वाले सुनील दर्शन ने इस फिल्म को निर्देशित किया है और यह इस साल की सबसे खराब फिल्मों में से एक है।
कहानी – एक लड़का है जिसे म्यूजिशियन बनने का सपना है, पापा को लगता है कि वह आवारागर्दी कर रहा है, माँ सपोर्ट करती है, जब वह एक लड़की से मिलता है, तो उसमें प्यार हो जाता है, फिर एक और लड़की से मिलता है, जिसे उस लड़के से प्यार हो जाता है, अर्थात दो लड़कियाँ और एक लड़का, ऐसी कहानी हमने इतनी बार सुनी देखी है कि अब इसकी एक्सपायरी डेट भी एक्सपायर हो चुकी है, अगले संदर्भ में कहानी में क्या होता है, यह देखने की हिम्मत हो तो थिएटर जाएंगे।
यह फिल्म एक सिरदर्द और पुराने जैसी कहानी के साथ है- लेकिन उसका ट्रीटमेंट नए और आधुनिक है। फिल्म 2025 की नहीं लगती है, जैसा कि इस समय के लिए अपडेटेड होना चाहिए। हीरो के गिटार ने शानदार काम किया है और हीरो का किरदार हर किसी को आकर्षित कर रहा है। हीरो की आंटी डॉली बिंद्रा भी अपने किरदार में उत्कृष्टता दिखाती है। फिल्म में गानों को बीच-बीच में इंटर्सपर्स करना दर्शकों के गुस्से को बढ़ा सकता है, जिससे उनका ध्यान भटक सकता है। ऐसी फिल्में जो इस तरह की होती हैं, पैसे और समय की बर्बादी होती हैं, और दर्शकों को धोखा देती हैं। आज के समय में, जब कंटेंट का स्तर बहुत ऊँचा है, इस तरह की फिल्में बनाना अजीब और अनुचित है।्यह फिल्म को बनाने वाले ही इसका कारण बता सकते हैं।
एक्टिंग-आयुष कुमार ने अच्छा काम किया है, उन्हें प्रमुख भूमिकाओं में देखकर उम्मीद जगाती है, उनके करेक्टर को स्क्रिप्ट के अनुसार निभाया गया है। आकायशा ने उचित काम किया है, उनका प्रदर्शन ठीक है। नताशा फर्नांडिस की एक्टिंग देखकर ऐसा लगा कि वे दबाव में हैं और उनसे अधिक काम नहीं हो रहा है। अन्य सभी कलाकारों ने किसी न किसी तरह का प्रभाव छोड़ा है।
राइटिंग और डायरेक्शन- सुनील दर्शन ने यह फिल्म निर्देशित की है और उन्होंने पांच लोगों के साथ मिलकर इस फिल्म की लिखी है, लेकिन इन लोगों द्वारा लिखित डायलॉग कुछ समझ से परे हैं। वे डायलॉग भाषा बहुत ही नकारात्मक है। इसके बावजूद, ऐसी राइटिंग क्यों की गई इसकी समझ नहीं आती है और निर्देशन भी कुछ हद तक खराब है। यह फिल्म देखने के बाद आपको यह लगेगा कि आजकल के समय में ऐसा क्यों हो रहा है।
म्यूजिक-नदीम ने एक फिल्म के लिए संगीत दिया है, समीर ने गाने लिखे हैं, और शान, नीरज श्रीधर, पलक मुछाल, जावेद अली जैसे कलाकारों ने इन गानों को गाया है, लेकिन संगीत में कुछ भी नया नहीं लगता। इस सब में समय और पैसे की बर्बादी हो रही है।

