पानी जिंदगी के लिए कितना महत्वपूर्ण है, यह सच रांची के छोटे-से गांव सुनुआबेड़ा में देखा जा सकता है। वहां के लोग, जो केवल मुट्ठी भर पानी के साथ हैं, भी अपने गांव की ओर बह रही पानी की धारा खो रहे हैं।

यहां आने के लिए आपको सड़क के करीब आठ किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। रास्ता इतना खराब है कि पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है, लेकिन इस गांव के लोगों की दृढ़ता ने एक अद्वितीय कहानी रच दी है। उन्होंने अपनी प्यास को मिटाने के लिए न केवल पानी उपलब्ध कराया बल्कि उन्होंने ऐसा कमाल कर दिखाया, जो केवल पुराने काल के महापुरुष ही कर सकते थे। उनके साथियों के साथ, यह गांव 2015 में स्मार्ट गवर्नेंस अवॉर्ड के लिए नॉमिनेट हुआ था। यहां की उपलब्धियों ने देश भर में जल संरक्षण के लिए एक नई मिसाल प्रस्तुत की है।

पानी बचाने की पहल होने के बाद इस गांव के लोगों ने उस मुहिम को लगातार कायम रखा. साथ ही, इसकी मदद से गांव और आसपास के इलाकों को भी डिवेलप किया. यह गांव कोई और नहीं, बल्कि रांची से करीब 40 किलोमीटर दूर मौजूद अनगड़ा प्रखंड का सुनुआबेड़ा गांव है, जहां रहने वालों की गिनती उंगली पर कर सकते हैं. आइए जानते हैं कि सुनुआबेड़ा के लोगों ने कैसे पानी बचाया और अपने गांव की किस्मत पलट दी.
पहले स्थितियां ऐसी थीं।
अनगड़ा प्रखंड के समाजसेवक ने बताया कि झारखंड में तरक्की हो रही है, परंतु अनगड़ा प्रखंड के गांव अब भी उपेक्षित हैं। गांवों में पैदल या साइकिल से जाना पड़ता है, और अगर किसी को शहर जाना है तो वो आठ किलोमीटर तक की दूरी तय करनी पड़ती है। रास्ते में बाइक सवार मिल जाता है तो पहुंचना आसान हो जाता है।

उन्होंने बताया कि अनगड़ा प्रखंड में सुनुआबेड़ा, गेठी कोचा और पीपराबेड़ा जैसे गांव हैं, जिनकी स्थिति पहले इतनी खराब थी कि पानी की भी कमी थी। वास्तव में, सुनुआबेड़ा के पहाड़ से बहने वाले प्राकृतिक नालों से आने वाला बारिश का पानी ही उनकी जिंदगी की एकमात्र आशा थी। जब गर्मियों में पानी सूख जाता तो लोग प्यासे रहते थे। गांव में मौजूद 200 एकड़ जमीन भी निर्जल रहती थी।
इस समस्या की वजह से हो जाती थी मुश्किलें।
सुनुआबेड़ा और आसपास के गांवों के बारे में चर्चा करें, कुछ साल पहले तक यहाँ पानी पीने के लिए केवल प्राकृतिक नाला उपलब्ध था, जिसमें बारिश के दिनों में पानी उपलब्ध था। हालांकि, मौसम के परिवर्तन के साथ पानी की कमी महसूस होने लगती थी, क्योंकि पानी को स्टोर करने का कोई साधन नहीं था। इस कारण पानी बिना रुके गेतलसूद नदी में बह जाता था और गर्मियों में कुएं सूख जाते थे। उस समय नदी के साथ-साथ कुएं में भरा पानी भी सूख जाता था।

गंदा पानी पीने को मजबूर थे लोग
गांव के लोगों के अनुसार, उस समय नदी का पानी ही एकमात्र साहारा था, परंतु जब नदी सूख जाती तो कुएं से पानी निकाला जाता था. ये कुएं नदी में प्राकृतिक होकर बने गड्ढे थे, जिनमें भरा पानी गंदा हो जाता था. जब कहीं भी पानी नहीं मिलता तो मजबूरी में उसी को पीना पड़ता था.
2011 में किस्मत एक नयी मोड़ ले आई।
गेठी कोचा गांव में निवास करने वाले सुरेश मुंडा ने बताया कि पानी की कमी से पूरा इलाका परेशान था, लेकिन किसी भी व्यक्ति के पास कोई समाधान नहीं था. वास्तव में, उस समय किसी के पास नैचुरल रिसोर्स से आने वाले इस पानी को बचाने का कोई इडिया नहीं था. गांव के लोग निरंतर इस समस्या का समाधान खोजते रहे, लेकिन उनकी आशा की किरण साल 2011 में उस समय जगमगाई जब झारखंड सरकार और रामकृष्ण मिशन के अधिकारी इस क्षेत्र का दौरा किया. उन्होंने बताया कि प्राकृतिक झरने से बहने वाले पानी को संग्रहित किया जा सकता है, जिससे इस क्षेत्र में पीने के पानी की समस्या सुलझा सकती है. इसके बाद जलछाजन योजना के तहत कार्य आरंभ किया गया.
रांची स्थित रामकृष्ण मिशन आश्रम के प्रमुख स्वामी भावेशानंद ने बताया कि अनगड़ा के लोग पानी की किल्लत से परेशान थे। उनके लिए समाधान ढूंढना काफी मुश्किल था क्योंकि वहाँ पहाड़ी इलाका था, जिसके कारण न तो बोरिंग का सुझाव दिया जा सकता था और न ही पानी को रोकने में सफलता मिल रही थी। इस समस्या का समाधान ढूंढने के लिए केंद्र और राज्य सरकार ने एक समेकित जलछाजन प्रबंधन कार्यक्रम शुरू किया।

उन्होंने बताया कि इन लोगों के जीवन में रंग भरने के लिए सरकार द्वारा नवीनतम योजनाओं का आयोजन किया जा रहा है, जिसकी सूचना गांव के निवासियों तक पहुंचाकर उन्हें लाभ पहुंचाया जा रहा है।

