लगातार बिना किसी मतलब के स्क्रीन देखना दिमाग की एक्टिविटी को धीरे-धीरे कम करता है. ज्यादा स्क्रीन टाइम से दिमाग को सही तरह की चुनौती नहीं मिलती, जिससे सोचने और समझने की क्षमता पर असर पड़ता है.
सोशल मीडिया पर घंटों बिना सोचे-समझे स्क्रॉल करने के बाद जो सुन्नपन और दिमागी थकान महसूस होती है, उसे आजकल ब्रेन रॉट कहा जा रहा है. यह शब्द 2024 में ऑक्सफोर्ड का वर्ड ऑफ द ईयर भी बना था. लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ एक इंटरनेट मीम है या वाकई दिमाग के अंदर कुछ गलत हो रहा है. इसे लेकर एक्सपर्ट्स माइंडलेस स्क्रॉलिंग के असर को समझाते हैं.

एक्सपर्ट्स के अनुसार लगातार बिना किसी मतलब के स्क्रीन देखना दिमाग की एक्टिविटी को धीरे-धीरे कम करता है. ज्यादा स्क्रीन टाइम से दिमाग को सही तरह की चुनौती नहीं मिलती, जिससे सोचने और समझने की क्षमता पर असर पड़ता है.

डॉक्टर बताते हैं कि रोजाना दो घंटे या उससे ज्यादा माइंडलेस स्क्रॉलिंग करने से दिमाग के ग्रे मैटर में कमी आ सकती है. यह असर दिमाग के उन हिस्सों पर पड़ता है, जो याददाश्त, फोकस और फैसले लेने से जुड़े होते हैं. लंबे समय में इससे ध्यान लगाने और जानकारी याद रखने में दिक्कत हो सकती है.

वहीं डॉक्टरों अनुसार ब्रेन रॉट कोई मजाक नहीं है. लगातार खाली और बिना मेहनत वाली डिजिटल स्टिमुलेशन से ऐसा लगता है, जैसे दिमाग धीरे-धीरे स्विच ऑफ हो रहा हो. यही वजह है कि घंटों स्क्रॉल करने के बाद लोग खुद को थका हुआ और अनफोकस्ड महसूस करते हैं.

एक्सपर्ट्स के अनुसार दिमाग को और ज्यादा स्टिमुलेशन नहीं चाहिए, बल्कि उसे उपलब्धि और मकसद की जरूरत होती है. इसके लिए बाहर निकलना, चलना-फिरना, साइकिल चलाना, दौड़ना या दोस्तों से मिलना ज्यादा फायदेमंद है. दिमाग असली जिंदगी के एक्सपीरियंस से ज्यादा एक्टिव होता है.

अगर ज्यादा स्क्रॉलिंग के बाद दिमाग भारी, सुन्न या ब्रेन-डेड जैसा लगे तो यह संकेत है कि अब फोन नहीं, बल्कि कोई असली काम करने की जरूरत है. बाहर जाना, कमरे की सफाई करना या कोई टालता हुआ काम पूरा करना दिमाग के लिए ज्यादा बेहतर साबित हो सकता है.


