Maharashtra Nagar Nigam Results: नागपुर दंगों के मुख्य आरोपी फहीम खान की पत्नी अलीशा खान ने AIMIM के टिकट पर नगर निकाय चुनाव जीत लिया. अलीशा ने आशी नगर वार्ड से बीजेपी उम्मीदवार को हराया है.
नागपुर महानगरपालिका चुनाव में एक ऐसा नतीजा सामने आया है, जिसने सियासी गलियारों में चर्चा तेज कर दी है. 2025 के नागपुर दंगों के मामले में मुख्य आरोपी की पत्नी अलीशा खान ने चुनाव जीतकर सबको चौंका दिया है. 29 वर्षीय अलीशा खान ने ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के टिकट पर नागपुर महानगरपालिका के आशी नगर जोन, वार्ड नंबर 3 से जीत दर्ज की.
अलीशा खान ने इस वार्ड से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की उम्मीदवार भाग्यश्री कनाटोडे को हराया. नतीजों के बाद इलाके में समर्थकों में खुशी देखी गई, वहीं विपक्षी दलों में इस जीत को लेकर सवाल भी उठने लगे हैं.
पति फहीम खान पर दर्ज हैं गंभीर मामले
अलीशा खान माइनॉरिटी डेमोक्रेटिक पार्टी (एमडीपी) के शहर अध्यक्ष फहीम खान की पत्नी हैं. फहीम खान पर 17 मार्च को भड़की नागपुर हिंसा के प्रमुख आरोपियों में शामिल होने का आरोप है. यह हिंसा उस वक्त हुई थी जब यह अफवाह फैली थी कि छत्रपति संभाजीनगर में औरंगजेब की कब्र हटाने की मांग को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान धार्मिक शिलालेखों वाली एक ‘चादर’ जला दी गई है.
कई धाराओं में केस, फिलहाल जमानत पर
फहीम खान के खिलाफ गणेशपेठ पुलिस थाने में भारतीय न्याय संहिता 2023 की कई धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया था. इसके अलावा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की रोकथाम अधिनियम और आर्म्स एक्ट भी लगाए गए हैं. फिलहाल वह जमानत पर बाहर हैं.
नागपुर में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन ने कुल 6 सीटें जीती हैं. पार्टी के पूर्व विदर्भ अध्यक्ष शाहिद रंगूनवाला का कहना है कि अलीशा और फहीम खान के प्रति लोगों में सहानुभूति है, क्योंकि उनका घर कथित तौर पर असंवैधानिक तरीके से तोड़ा गया था. उनके मुताबिक, लोगों ने अलीशा खान के साथ हुई नाइंसाफी के खिलाफ वोट दिया.
नागपुर नगर निगम का कुल गणित
151 सदस्यीय नागपुर महानगरपालिका में बीजेपी और शिवसेना गठबंधन को 102 सीटें मिली हैं. कांग्रेस को 35, अजित पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को 1, ठाकरे गुट की शिवसेना को 2, बीएसपी को 1, एआईएमआईएम को 6 और मुस्लिम लीग को 4 सीटें हासिल हुई हैं. इस नतीजे ने साफ कर दिया है कि स्थानीय मुद्दे और सहानुभूति कई बार बड़े राजनीतिक समीकरणों पर भारी पड़ जाते हैं.

