
Non Hindu Entry Ban: हाल के दिनों में हरिद्वार स्थित हर की पौड़ी पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाने की मांग तेज हुई है। 2027 में प्रस्तावित अर्ध कुंभ मेले से पहले यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इस तरह का प्रतिबंध कानूनन लागू किया जा सकता है या नहीं।
हरिद्वार को हिंदू धर्म के सात सबसे पवित्र नगरों में गिना जाता है। यहां हर 12 साल में कुंभ और हर 6 साल में अर्ध कुंभ मेले का आयोजन होता है। हर की पौड़ी को इस धार्मिक नगरी का आध्यात्मिक केंद्र माना जाता है, जहां गंगा स्नान, गंगा आरती और पितृ तर्पण जैसे अनुष्ठानों को मोक्ष से जोड़कर देखा जाता है। इसी कारण कई धार्मिक संगठनों का कहना है कि बड़े आयोजनों के दौरान इसकी पवित्रता बनाए रखना जरूरी है।
हर की पौड़ी केवल एक घाट नहीं, बल्कि आस्था का प्रतीक मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यहां किए गए कर्म विशेष फल देते हैं। समर्थकों का तर्क है कि कुंभ जैसे आयोजनों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के चलते धार्मिक मर्यादा बनाए रखने के लिए सख्त नियम जरूरी हैं।
हरिद्वार नगर निगम का दावा है कि हर की पौड़ी पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक कोई नई व्यवस्था नहीं है। अधिकारियों के अनुसार, आजादी से पहले बनाए गए नगर निगम के उपनियमों में इस संबंध में एक प्रावधान मौजूद है। निगम की नियमावली के पॉइंट नंबर 20 में धार्मिक पवित्रता बनाए रखने के उद्देश्य से इस तरह के प्रतिबंध का उल्लेख किया गया है। समर्थकों का कहना है कि यह नियम ऐतिहासिक रूप से लागू रहा है और प्रशासनिक स्तर पर इसे समर्थन मिलता रहा है।
इस मांग को 1916 के एक ऐतिहासिक समझौते से भी जोड़ा जाता है, जिसमें पंडित मदन मोहन मालवीय और तत्कालीन ब्रिटिश प्रशासन शामिल थे। उस समझौते का उद्देश्य हरिद्वार में गंगा की पवित्रता और हिंदू धार्मिक परंपराओं की रक्षा करना बताया जाता है।
हालांकि, संवैधानिक दृष्टि से यह मामला जटिल है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15(2)(बी) सार्वजनिक स्थानों और सरकारी संसाधनों से संचालित सुविधाओं में धर्म के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है। चूंकि हर की पौड़ी का रखरखाव सरकारी संसाधनों से होता है, इसलिए पूर्ण प्रतिबंध को अदालत में असंवैधानिक करार देकर चुनौती दी जा सकती है। वहीं, अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है और धार्मिक समुदायों को अपने धार्मिक मामलों के प्रबंधन की अनुमति भी देता है। इसी टकराव के कारण यह मुद्दा कानूनी और संवैधानिक बहस का विषय बना हुआ है।

