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Saturday, January 31, 2026
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अकबर के दरबार का प्रिय रत्न, लेकिन मौत के बाद भी नसीब नहीं हुआ अंतिम संस्कार

अकबर के दरबार का प्रिय रत्न बीरबल और उनका दर्दनाक अंत

मुगल दरबार में हाजिरजवाबी, बुद्धिमानी और हास्य के लिए मशहूर बीरबल, अकबर के सबसे भरोसेमंद सलाहकार थे। नवरत्नों में शामिल बीरबल सिर्फ एक मंत्री नहीं, बल्कि बादशाह के जीवन और निर्णयों में अहम हिस्सा थे। इरा मुखोती की किताब ‘द ग्रेट मुगल’ में अकबर और बीरबल के खास रिश्ते का जिक्र मिलता है, जिसमें अकबर कई बार अपनी राय में बीरबल को सर्वोच्च महत्व देते थे।

हाथी वाला किस्सा: अकबर ने बचाई जान
1583 में फतेहपुर सीकरी में हाथियों की लड़ाई का आयोजन हुआ। अचानक एक बेकाबू हाथी बीरबल की ओर बढ़ा और उन्हें सूंड में उठाकर हवा में लहरा दिया। दरबार में अफरा-तफरी मच गई, लेकिन अकबर खुद घोड़े पर सवार होकर आगे बढ़े और हाथी का ध्यान भटका दिया, जिससे बीरबल की जान बच गई। इस घटना ने दिखाया कि अकबर उन्हें कितना महत्व देते थे।

तीन साल बाद बदला किस्मत का खेल
1586 में अफगानिस्तान के स्वात और बाजौर इलाके में युसूफजई कबीलों ने मुगल शासन के खिलाफ विद्रोह किया। अकबर ने मदद के लिए दो नाम सुझाए—अबुल फजल और बीरबल। अकबर ने अपनी सबसे बड़ी भूल करते हुए बीरबल को 8,000 सैनिकों के साथ बाजौर भेजा। हालांकि बीरबल बुद्धि और कूटनीति में माहिर थे, युद्ध उनकी ताकत नहीं थी।

अंदरूनी कलह और घात
बाजौर में बीरबल और सिपहसालार जैन खान कोका की रणनीतियां टकराती रहीं। इसी बीच अफगानी कबीलों ने घात लगाकर रात में हमला किया। बलंदरी घाटी में अचानक हुए हमले में 8,000 से ज्यादा मुगल सैनिक मारे गए। बीरबल भी पत्थरों के नीचे दबकर मारे गए और पहाड़ी इलाक़े के कारण उनका शव कभी नहीं मिला।

दर्दनाक अंत और अकबर का सदमा
बीरबल की मौत अकबर के लिए गहरा सदमा साबित हुई। अबुल फजल ने अकबरनामा में लिखा कि बीरबल के निधन ने अकबर को अंदर तक तोड़ दिया। बदायूंनी जैसे इतिहासकार, जो अक्सर बीरबल से ईर्ष्या रखते थे, उन्होंने भी माना कि अकबर किसी की मौत पर इतना टूटते नहीं दिखे। बीरबल का अंतिम संस्कार न हो पाना अकबर के जीवन का सबसे बड़ा दुख था।

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