
डॉलर के मुकाबले रुपया पहली बार 90 के पार चला गया है, जिससे बाजार में चिंता बढ़ी है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में रुपया 91 के स्तर तक भी कमजोर हो सकता है। रुपये की गिरावट का सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ता है, क्योंकि आयातित वस्तुएं और रोजमर्रा की कई चीजें महंगी हो जाती हैं। हालांकि गिरता रुपया अर्थव्यवस्था के कुछ सेक्टर्स के लिए फायदेमंद भी साबित हो सकता है।
रुपये की कमजोरी से भारतीय निर्यात को बढ़ावा मिल सकता है। जब रुपये का मूल्य कम होता है तो भारतीय उत्पाद विदेशों में सस्ते हो जाते हैं, जिससे उनकी मांग बढ़ने की संभावना रहती है और एक्सपोर्टर्स को ग्लोबल मार्केट में प्रतिस्पर्धा करने में आसानी मिलती है।
आईटी सेक्टर भी इस स्थिति से लाभ उठा सकता है। भारतीय आईटी कंपनियों की कमाई का बड़ा हिस्सा डॉलर में होता है, इसलिए रुपये में गिरावट से उनका मुनाफा बढ़ सकता है। देश की कई टेक कंपनियां विदेशों को सेवाएं उपलब्ध कराती हैं, ऐसे में बढ़ी हुई कमाई का असर अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक पड़ सकता है।
कमजोर रुपये से निर्यात बढ़ने के साथ-साथ सस्ते चीनी उत्पादों के आयात पर भी अंकुश लग सकता है, जिससे घरेलू उद्योगों को राहत मिलेगी। निर्यात में सुधार अमेरिकी टैरिफ के असर को कम करने में मदद कर सकता है और इससे ट्रेड बैलेंस बेहतर होने की उम्मीद है।
रुपये की कमजोरी रेमिटेंस यानी प्रवासी भारतीयों द्वारा भेजे जाने वाले पैसों में भी तेजी ला सकती है। एक डॉलर के बदले ज्यादा रुपये मिलने से एनआरआई ज्यादा धन भेजने के लिए प्रोत्साहित हो सकते हैं। वित्त वर्ष 2025 में भारत को 135.5 अरब डॉलर का रेमिटेंस मिला, जो पिछले वर्ष के 118.7 अरब डॉलर से अधिक है। बढ़ा हुआ रेमिटेंस देश के ट्रेड डेफिसिट को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

