समराला में क्रिश्चियन रिसर्च एंड एड फाउंडेशन की ओर से आयोजित एक विशेष कार्यशाला में “भारत में धार्मिक नेतृत्व: मुद्दे और चुनौतियां” विषय पर विस्तृत चर्चा की गई। इस अवसर पर प्रो. इमैनुअल नाहर ने मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए धार्मिक नेतृत्व की वर्तमान स्थिति, उसके मूल्यों और सामने आ रही चुनौतियों पर गहन प्रकाश डाला। कार्यशाला में देश के विभिन्न राज्यों से आए प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया, जिससे विषय की प्रासंगिकता और गंभीरता स्पष्ट रूप से सामने आई।

अपने संबोधन में डाक्टर नाहर ने कहा कि यीशु मसीह विश्व इतिहास के महानतम नेताओं में से एक हैं, जिनका नेतृत्व शक्ति या अधिकार पर नहीं, बल्कि प्रेम, त्याग, विनम्रता और सत्य जैसे मूल्यों पर आधारित था। उन्होंने यीशु के दो महत्वपूर्ण संदेशों को रेखांकित करते हुए कहा कि “अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करो” और “पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं” जैसे विचार सच्चे नेतृत्व की पहचान हैं। उन्होंने कहा कि ये शिक्षाएं दर्शाती हैं कि वास्तविक नेतृत्व नैतिक और आध्यात्मिक होता है, न कि केवल राजनीतिक या संस्थागत।
डाक्टर नाहर ने बाइबिल के अन्य महान नेताओं का भी उल्लेख किया, जिनमें मूसा, राजा डेविड, सोलोमन और नेहेमायाह शामिल हैं। उन्होंने बताया कि मूसा ने साहस और विश्वास के साथ लोगों को दासता से मुक्ति दिलाई, जबकि राजा डेविड ने भक्ति और आत्मचिंतन के माध्यम से नेतृत्व का उदाहरण प्रस्तुत किया। सोलोमन अपनी बुद्धिमत्ता और न्यायप्रियता के लिए जाने जाते हैं, वहीं नेहेमायाह ने दृढ़ संकल्प और प्रार्थना के बल पर समाज के पुनर्निर्माण का कार्य किया। इन सभी उदाहरणों के माध्यम से उन्होंने स्पष्ट किया कि नेतृत्व के विभिन्न आयाम होते हैं, जैसे विश्वास, बुद्धि, साहस और दूरदृष्टि।

वर्तमान समय में धार्मिक नेताओं के सामने आ रही चुनौतियों पर चर्चा करते हुए डाक्टर नाहर ने कहा कि कई बार नेता अपने उपदेशों पर स्वयं अमल नहीं करते, जिससे लोगों का विश्वास कमजोर होता है। उन्होंने यह भी कहा कि कई धार्मिक नेता अन्याय, सांप्रदायिकता और उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने से कतराते हैं। इसके अलावा, कुछ संस्थाएं सेवा और सत्य की बजाय सत्ता और अस्तित्व को अधिक प्राथमिकता देने लगी हैं। उन्होंने जाति, वर्ग और धर्म के आधार पर बढ़ती विभाजनकारी प्रवृत्तियों को भी नेतृत्व के लिए बड़ी बाधा बताया।
डाक्टर नाहर ने इस बात पर जोर दिया कि आज के दौर में भौतिकवाद और स्वार्थ ने विश्वास और त्याग की भावना को कमजोर किया है। ऐसे में एक अच्छे नेता के लिए चरित्र, ईमानदारी, आदर्श आचरण, मानवता की सेवा और ईश्वर के प्रति निष्ठा अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि नेतृत्व कोई पद नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी और आह्वान है।
कार्यशाला में परिवर्तनकारी नेतृत्व की आवश्यकता पर भी विशेष चर्चा की गई। डाक्टर नाहर ने ‘सर्वेंट लीडरशिप’ यानी सेवाभाव आधारित नेतृत्व, ‘शेफर्ड लीडरशिप’ यानी संरक्षण और मार्गदर्शन करने वाला नेतृत्व, और ‘ट्रांसफॉर्मेशनल लीडरशिप’ यानी समाज में सकारात्मक बदलाव लाने वाले नेतृत्व को आज की जरूरत बताया। उन्होंने कहा कि ऐसे नेता ही न्याय को बढ़ावा दे सकते हैं, एकता स्थापित कर सकते हैं और समाज में नैतिक मूल्यों को सशक्त बना सकते हैं।
अंत में उन्होंने कहा कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में धार्मिक नेतृत्व की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। इसे शांति और सद्भाव को बढ़ावा देना चाहिए, अन्याय और भेदभाव के खिलाफ खड़ा होना चाहिए, विभिन्न धर्मों के बीच संवाद को प्रोत्साहित करना चाहिए और समाज के कमजोर व वंचित वर्गों के उत्थान के लिए कार्य करना चाहिए।
कार्यशाला का निष्कर्ष यही रहा कि आज के समय में सच्चा नेतृत्व वही है, जो प्रेम, न्याय और विश्वास के आधार पर समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सके। प्रो. नाहर के अनुसार, यीशु मसीह का नेतृत्व मॉडल आज भी उतना ही प्रासंगिक है और वर्तमान समय की आवश्यकता भी।

