
World War III:
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बढ़ते तनाव के बीच तीसरे विश्व युद्ध की आशंका पर चर्चा तेज हो गई है। यूरोप, मिडिल ईस्ट और एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में जारी टकराव वैश्विक अस्थिरता को बढ़ा रहे हैं। इजरायल-ईरान संघर्ष के बड़े युद्ध में बदलने की आशंका, रूस-अमेरिका के बीच लगातार तनाव और डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड को लेकर दिए गए बयान इस चिंता को और गहरा कर रहे हैं। सैन्य विश्लेषकों और भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तीसरा विश्व युद्ध हुआ, तो दुनिया अव्यवस्थित तरीके से नहीं बंटेगी, बल्कि स्पष्ट गुटों में विभाजित होगी।
नाटो के नेतृत्व वाला पश्चिमी गुट
संभावित युद्ध की स्थिति में पश्चिमी ब्लॉक की अगुवाई लगभग तय रूप से अमेरिका करेगा। यह गुट मौजूदा नाटो गठबंधन का विस्तारित रूप हो सकता है। यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जर्मनी, इटली और नाटो के अन्य यूरोपीय देश इसकी रीढ़ होंगे। एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया अहम रणनीतिक भूमिका निभा सकते हैं, जबकि कनाडा भी इस गुट को मजबूती देगा। मध्य पूर्व में इजरायल की भूमिका खासतौर पर ईरान से जुड़े संघर्षों में निर्णायक हो सकती है।
चीन-रूस के नेतृत्व वाला विरोधी पावर सेंटर
दूसरी ओर चीन और रूस के नेतृत्व में एक ऐसा गुट उभर सकता है, जो अमेरिका-केंद्रित वैश्विक व्यवस्था को चुनौती देगा। यह नाटो जैसा औपचारिक सैन्य गठबंधन नहीं होगा, बल्कि रणनीतिक साझेदारी पर आधारित एक धड़ा हो सकता है। ईरान और उत्तर कोरिया जैसे देश लंबे समय से अमेरिका विरोधी रुख के चलते इस खेमे के करीब आ सकते हैं। बेलारूस रूस के साथ मजबूती से खड़ा रहेगा, जबकि कुछ अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देश पश्चिमी प्रतिबंधों और हस्तक्षेप की आलोचना करते हुए राजनीतिक या लॉजिस्टिक समर्थन दे सकते हैं।
फ्लोटिंग देश कौन होंगे?
तीसरे विश्व युद्ध की स्थिति में कुछ देश ऐसे भी होंगे, जो किसी एक गुट के साथ पूरी तरह खड़े नहीं होंगे। तुर्की इसका प्रमुख उदाहरण माना जा रहा है, जो नाटो का सदस्य होने के बावजूद रूस और ब्रिक्स देशों के साथ मजबूत संबंध रखता है। सऊदी अरब भी ऐतिहासिक रूप से अमेरिका का सहयोगी रहा है, लेकिन ऊर्जा और आर्थिक हितों के चलते वह संतुलित या न्यूट्रल रुख अपना सकता है।
न्यूट्रल रहने की कोशिश करने वाले देश
कई देश सक्रिय रूप से तटस्थ रहने का प्रयास करेंगे और सैन्य गठबंधनों से दूरी बनाए रखेंगे। स्विट्जरलैंड अपनी सदियों पुरानी न्यूट्रैलिटी पर कायम रह सकता है। आइसलैंड का भौगोलिक स्थान और सीमित रणनीतिक जोखिम उसे सीधे संघर्ष से दूर रख सकता है।
ग्लोबल साउथ में ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, अर्जेंटीना, चिली और उरुग्वे जैसे देश किसी एक पक्ष का खुला समर्थन करने से बच सकते हैं। वहीं खाड़ी क्षेत्र में यूएई और कतर जैसे देश अपने वित्तीय हितों और ऊर्जा निर्यात की सुरक्षा के लिए संतुलित नीति अपनाने की कोशिश करेंगे।
तीसरे विश्व युद्ध में भारत की भूमिका
अगर तीसरा विश्व युद्ध हुआ, तो भारत की भूमिका पर सबसे ज्यादा नजर रहेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत किसी सैन्य गुट में सीधे शामिल होने के बजाय रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखेगा। भारत से एक मध्यस्थ, सप्लाई-चेन स्टेबलाइजर और विरोधी गुटों के बीच कूटनीतिक सेतु की भूमिका निभाने की उम्मीद की जा रही है। भारत का लक्ष्य वैश्विक आर्थिक झटकों से बचना, क्षेत्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना और खुद को बड़े सैन्य संघर्ष में फंसने से दूर रखना होगा।

