
Protests in Iran: ईरान में रियाल की ऐतिहासिक गिरावट ने आम लोगों की आर्थिक हालत को बुरी तरह प्रभावित किया है। देश के कई हिस्सों में महंगाई, बेरोजगारी और बढ़ती जीवन-यापन लागत के खिलाफ व्यापक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। इन प्रदर्शनों में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के खिलाफ भी नाराजगी खुलकर सामने आ रही है। राजधानी तेहरान समेत कई शहरों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है, जबकि हालात को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन लगातार कदम उठा रहा है। इस बीच इंटरनेट और संचार सेवाओं पर अस्थायी पाबंदियों की खबरों ने आम लोगों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या ईरान की करेंसी भारतीय रुपये से भी कमजोर हो चुकी है?
ईरानी रियाल की गिरावट की वजह
ईरानी रियाल पिछले कई वर्षों से भारी दबाव में है। इसकी सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हैं। वर्ष 2018 में अमेरिका के न्यूक्लियर डील से बाहर होने के बाद ईरान पर सख्त आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए, जिससे तेल निर्यात प्रभावित हुआ। विदेशी मुद्रा की आमद घटने और बैंकिंग लेन-देन पर रोक के कारण डॉलर की भारी किल्लत पैदा हुई, जिसका सीधा असर रियाल की वैल्यू पर पड़ा।
रियाल की मौजूदा वैल्यू कितनी?
सरकारी दरों और ओपन मार्केट रेट्स में बड़ा अंतर देखा जाता है। जनवरी 2026 के आसपास ओपन मार्केट में 1 भारतीय रुपया करीब 16,700 ईरानी रियाल के बराबर आंका गया। यह आंकड़ा बताता है कि रियाल ने बीते वर्षों में अपनी कीमत कितनी तेजी से गंवाई है। आम नागरिकों के लिए इसका मतलब यह है कि उनकी बचत की वैल्यू लगभग खत्म हो चुकी है और रोजमर्रा का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है।
रुपये के मुकाबले रियाल की खरीद क्षमता
अगर खरीद क्षमता की तुलना करें तो स्थिति और साफ हो जाती है। भारत में 100 रुपये से सीमित ही सही, कुछ बुनियादी जरूरतें पूरी हो सकती हैं। वहीं ईरान में वही 100 रुपये, जो करीब 16.7 लाख रियाल के बराबर होते हैं, उनसे रोजमर्रा के छोटे खर्च पूरे किए जा सकते हैं। हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि ईरान में जीवन सस्ता हो गया है। महंगाई इतनी ज्यादा है कि बड़ी रकम होने के बावजूद लोगों की परेशानियां कम नहीं हो रहीं।
क्यों नहीं संभल पा रही ईरान की अर्थव्यवस्था?
आर्थिक जानकारों के मुताबिक, ईरान की समस्याएं सिर्फ हाल के वर्षों की नहीं हैं। दशकों से चली आ रही बदइंतजामी, सरकारी नियंत्रण, भ्रष्टाचार के आरोप, विदेशी निवेश की कमी और राजनीतिक अनिश्चितता ने हालात को और खराब किया है। क्षेत्रीय तनाव और वैश्विक दबाव भी रियाल की कमजोरी को बढ़ा रहे हैं।
भारत और ईरान की करेंसी में अंतर
जहां ईरान की मुद्रा प्रतिबंधों और महंगाई के कारण लगातार कमजोर हो रही है, वहीं भारतीय रुपया वैश्विक चुनौतियों के बावजूद तुलनात्मक रूप से स्थिर बना हुआ है। भारत की विविध अर्थव्यवस्था, मजबूत घरेलू बाजार और विदेशी निवेशकों का भरोसा रुपये को सहारा देता है। यही वजह है कि मौजूदा समय में भारतीय रुपया, ईरानी रियाल की तुलना में कहीं अधिक मजबूत नजर आता है।

