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Saturday, December 6, 2025
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“Artificial Womb: वैज्ञानिकों ने बनाया कृत्रिम गर्भ, प्रीमैच्योर बच्चों के लिए नई उम्मीद”

Artificial Womb Technology: विज्ञान की नई क्रांति
विज्ञान ने आज इतनी तरक्की कर ली है कि जो कभी असंभव लगता था, अब संभव हो गया है। नीदरलैंड और जर्मनी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जो समय से पहले जन्मे शिशुओं के लिए जीवनदान साबित हो सकती है। इस आर्टिफिशियल वॉम्ब या कृत्रिम गर्भाशय को “AquaWomb” नाम दिया गया है। इसे खासतौर पर उन बच्चों के लिए डिजाइन किया गया है जो गर्भावस्था के 22 से 24 हफ्तों के बीच जन्म लेते हैं—एक ऐसा चरण जहां उनके जीवित बचने की संभावना बेहद कम होती है।

कैसे काम करता है AquaWomb?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह सिस्टम एक तरल पदार्थ से भरे पारदर्शी टैंक में काम करता है, जो आकार में लगभग एक मछलीघर जितना होता है। टैंक का तापमान 37.6 डिग्री सेल्सियस पर स्थिर रखा जाता है। इसके भीतर एक नरम डबल-लेयर झिल्ली होती है, जिसके अंदर बच्चा तैरता और विकसित होता है। एक सिंथेटिक प्लेसेंटा के माध्यम से बच्चे तक ऑक्सीजन और पोषक तत्व पहुंचाए जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे मां के गर्भ में होता है।

वैज्ञानिकों की राय
एंडहोवन यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के प्रोफेसर फ्रांस वैन डे वोसे ने बताया कि इस तकनीक में सबसे बड़ी चुनौती बच्चे के फेफड़ों की होती है। उन्होंने कहा, “यह ऐसा है जैसे जलती हुई दस गेंदों को एक साथ उछालना और किसी को भी गिरने न देना।” अगर यह प्रयोग सफल होता है, तो यह तकनीक प्रीमैच्योर बच्चों की जान बचाने में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है। वर्तमान में ऐसे बच्चे वेंटिलेटर और इनक्यूबेटर पर निर्भर रहते हैं, जिससे फेफड़ों को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है।

माता-पिता से जुड़ाव की कोशिश
AquaWomb की सह-संस्थापक और सीईओ मिर्थे वैन डेर वेन का कहना है कि “हम सिर्फ जीवन बचाना नहीं चाहते, बल्कि माता-पिता को अपने बच्चे से जुड़ाव महसूस कराने का मौका देना चाहते हैं।” कुछ प्रोटोटाइप्स में ऐसे पोर्ट बनाए गए हैं जिनसे माता-पिता बच्चे को छू सकते हैं। साथ ही “यूट्रस फोन” नामक फीचर के जरिए माता-पिता की आवाज़ और दिल की धड़कन एम्नियोटिक फ्लूइड में प्रसारित की जा सकती है, जिससे बच्चा सुरक्षित माहौल में अपने माता-पिता को महसूस कर सके।

नैतिक और कानूनी चुनौतियाँ
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह तकनीक चिकित्सा जगत में नई नैतिक और भावनात्मक बहसों को जन्म दे सकती है। डर्हम यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर एलिजाबेथ क्लोए रोमैनिस के मुताबिक, “यह इंसानी विकास का नया चरण होगा, जिसके लिए अभी तक कोई कानूनी या नैतिक परिभाषा तय नहीं है।”

अमेरिकी FDA (Food and Drug Administration) ने 2023 में पहली बार इंसानों पर इस तकनीक के ट्रायल की दिशा में एक कमेटी बनाई थी। शुरुआती परीक्षण उन शिशुओं पर किए जा सकते हैं जो 24 हफ्तों से पहले जन्म लेते हैं और जिनकी जीवित रहने की संभावना वर्तमान चिकित्सा तरीकों से बहुत कम होती है।

भविष्य की दिशा
अमेरिकी कंपनी Vitara Biomedical ने इसी तरह की “Biobag” तकनीक पर काम करने के लिए 125 मिलियन डॉलर जुटाए हैं। इससे संकेत मिलता है कि क्लिनिकल ट्रायल जल्द शुरू हो सकते हैं। हालांकि बायोएथिक्स एक्सपर्ट चेतावनी देते हैं कि जहां यह तकनीक लाखों जिंदगियां बचा सकती है, वहीं यह गर्भावस्था और मातृत्व की पारंपरिक परिभाषाओं को भी चुनौती दे सकती है।

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